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تعیین سیاست خارجی امریکا در قبال تهران [--، وستی کافکازا (روسیه)، 10 فوربه 2019] (اداره کل رسانه های خارجی، مترجم: شادی اصغری]

تعیین سیاست خارجی امریکا در قبال تهران [--، وستی کافکازا  (روسیه)، 10 فوربه 2019] (اداره کل رسانه های خارجی، مترجم: شادی اصغری]
در روز 11 ماه فوریه در ایران، جشن چهلمین سالگرد پیروزی انقلاب اسلامی برگزار خواهد شد. بوریس دولگوف، کارمند علمی ارشد مرکز مطالعات کشورهای عربی و اسلامی در انستیتوی خاور شناسی آکادمی علوم روسیه، معتقد است: «این رویداد اوضاع منطقه، سیاست جهانی، جهان اسلام و موازنه نیروهای سیاسی در عرصه جهانی را تغییر داد».

تعیین سیاست خارجی امریکا در قبال تهران
در روز 11 ماه فوریه در ایران، جشن چهلمین سالگرد پیروزی انقلاب اسلامی برگزار خواهد شد. بوریس دولگوف، کارمند علمی ارشد مرکز مطالعات کشورهای عربی و اسلامی در انستیتوی خاور شناسی آکادمی علوم روسیه، معتقد است: «این رویداد اوضاع منطقه، سیاست جهانی، جهان اسلام و موازنه نیروهای سیاسی در عرصه جهانی را تغییر داد». بوریس دولگوف گفت: «در نتیجه پیروزی انقلاب اسلامی، رژیم جدید تشکیل یافت که راه جدید توسعه را ترسیم کرد. اصول مطرح شده از سوی آیت الله خمینی (ره) و هوادارانش هنوز نیز اجرا می شود. ایران به رغم فشارهای امریکا و متحدانش در حال توسعه است. ایران به مرکز نیروی منطقه تبدیل شده است که بر سیاست جهانی تاثیر گذار است. رژیم ایران موفق شده است، با فشار خارجی و تحریم ها مقابله کند و جامعه را متحد و یکپارچه و اقتصاد کشور را پابرجا نگه دارد. در حال حاضر، ما در ایران شاهد مشکلات بزرگی مانند آن چه که در کشورهای توسعه یافته و دموکراتیک وجود دارد، نیستیم».
ایرینا فدوروا، کارمند علمی ارشد مرکز مطالعات کشورهای خاور نزدیک و خاور میانه، معتقد است: «مورخان انقلاب ایران را با انقلاب سال 1917 میلادی در روسیه مقایسه می کنند. اوضاع بین المللی بعد از پیروزی انقلاب اسلامی در ایران به شدت تغییر کرد. اگر انقلاب اسلامی در ایران پیروز نمی شد، اوضاع امروز در جهان کاملا متفاوت بود. رژیم ایران بعد از رسیدن به قدرت، بلافاصله، مشی خارجی کشور را تغییر داد. اگر مشی پیشین باقی مانده بود، در آنصورت نیروهایی که مخالف رژیم اسلامی بودند، می توانستند، موفق تر عمل کنند». به گفته وی، سیاست خارجی ایران بر پایه سر دادن شعارهایی در ضدیت با نیروهای دشمن و انتقال انقلاب اسلامی به دیگر کشورها است. ایران از گروهک های شیعه در کشورهای عربی حمایت می کند. این کارشناس معتقد است: «مشی ضد امریکایی ایران به صورت ریشه ای، روابط با امریکا را تغییر داده است. در دوران رژیم شاه، امریکا متحد ایران بود. در دوران کنونی نیز امریکا تعیین کننده سیاست خارجی ایران است، فقط با این تفاوت که نیروی دشمن ایران در عرصه بین المللی بشمار می رود. ضدیت ایران با امریکا باعث شده است تا نظامیان امریکایی برای دفاع از منافع ملی خود در آسیای جنوب غربی باقی بمانند. این امر به افزایش حضور نظامی امریکا در منطقه منجر شده است».
اسلام بیک موزلویف، ترکیه شناس و مدیر گروه زبان های شرقی، در رابطه با روابط ایران معاصر با روسیه و ترکیه، خاطر نشان کرد: «با میانجی گری روسیه، همکاری منطقه ای خوبی میان ترکیه و ایران برقرار است. این دستاورد بسیار مهمی است. رویارویی های تاریخی میان ترکیه و ایران هنوز از میان نرفته است، اما روسیه، ایران و ترکیه با مشکلات مشترک خود می توانند مقابله کنند. ترکیه موفق نشد، از ایران در رابطه با برنامه هسته ای اش حمایت کند، زیرا هنوز این کشور تحت سلطه امریکا قرار داشت، اما اکنون، اوضاع تغییر کرده است. برای نمونه، در روز 14 ماه فوریه، دیدار مرحله ای سه کشور قالب آستانه برگزار خواهد شد که طی آن قرار است، مساله سوریه حل و فصل شود. میانجی گری روسیه باعث شده است تا ایران و ترکیه به بازیکنان مهم منطقه ای تبدیل شوند».
منبع: اداره کل رسانه های خارجی

 

США до сих пор определяют внешнюю политику Тегерана

11 февраля в Иране будут отмечать 40 лет со дня победы Исламской революции. "Это событие изменило ситуацию и в регионе, и в глобальной политике, и в исламском, и в арабо-мусульманском мире, баланс политических сил в глобальном плане", - считает ведущий научный сотрудник Центра арабских и исламских исследований Института востоковедения РАН Борис Долгов.
"В результате этой Исламской революции было создано новое государство, которое предложило новый путь развития. Принципы, заложенные Хомейни и его сторонниками, на которых была построена ИРИ, продолжают действовать и сегодня. Государство развивается, несмотря на беспрецедентное внешнее давление США и их союзников. Иран стал региональным центром силы, влияющим на глобальную политику. Иранским руководителям удалось противостоять внешнему давлению, санкциям, объединить общество, построить такую экономику, которая смогла динамично развиваться. В Иране сегодня нет масштабных проблем, которые мы видим даже в развитых, демократичных странах, например, движение ”желтых жилетов” во Франции", - заявил Борис Долгов.
"Историки сравнивают революцию в Иране с революцией в 1917 года в России. Международная ситуация после Исламской революции в Иране претерпела резкое, конкретное и жесткое изменение. Если бы не было революции в Иране, сегодняшняя ситуация в мире была бы совершенно иной. Руководство ИРИ сразу после прихода к власти жестко изменило внешний курс. Если бы курс оставался прежним, то силы, которые выступали против исламского режима, против руководства страной аятоллой Хомейни, могли получить дополнительную подпитку со стороны Запада, что могло бы привести к смене исламского режима", - пояснила старший научный сотрудник Центра изучения стран Ближнего и Среднего Востока Института востоковедения РАН, эксперт по Ирану Ирина Федорова.
По ее словам, в то время для внешней политики Ирана были характерны лозунги борьбы угнетенных против угнетателей во всем мире и экспорта Исламской революции для этих целей: "Этот экспорт революции и борьба проходила не только на дипломатическом уровне. Иран поддерживал прошиитские группировки в арабских странах, оказывал им военную поддержку, что привело к объединению многих арабских государств на антииранской основе и созданию тех или иных союзов арабских государств, в частности, Союза арабских государств Персидского залива. Иран оказывал поддержку и принял участие в создании такой мощной группировки как ”Хезболла”".
Ирина Федорова считает, что антиамериканизм, который был характерен для пришедшего к власти режима в Иране, коренным образом изменил систему отношений с США: "При шахе США определяли внешнюю политику Ирана и были союзниками. При Исламской республике США также определяют внешнюю политику Ирана, только с прямо противоположным знаком, являясь самой крупной, самой серьезной силой, которая противостоит Ирану на международной арене. Влияние США по своему объему осталось прежним". По мнению эксперта, антиамериканизм привел к появлению доктрины Картера: "Американские военные силы стало возможным использовать для защиты национальных интересов США в Юго-Западной Азии. Это привело к резкому наращиванию военного присутствия США в регионе".
Говоря об отношениях современного Ирана с Россией и Турцией, заведующий кафедрой восточных языков Дипломатической академии МИД России, тюрколог Асламбек Мозлоев заметил: "Удалось продолжить первые тропинки к региональному сотрудничеству между Турцией и Ираном при посредничестве РФ. Это очень серьезное достижение. Исторические противоречия между Турцией и Ираном никуда не делись. Однако Россия, Иран и Турция, вычленили для себя те проблемы, которые которых позволить им снять противоречия. В свое время иранскую ядерную проблему не удалось решить при посредничестве Анкары, поскольку Турция тогда еще не решалась освободиться от американского протектората, и Иран все время ощущал, что за спиной Турции стоят США. Сегодня ситуация меняется. Так, 14 февраля пройдет очередная встреча астанинской тройки, которая заменила ооновский институт в плане решения сирийской проблемы. Посредничество России позволило и Ирану, и Турции подняться на уровень глобальных игроков".


 

 

۲۲ بهمن ۱۳۹۷ ۱۷:۱۹
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